ग़ज़ल

1. *** कहानी बदल दे ***
वो चाहे तो पूरी कहानी बदल दे .
बुढ़ापा बदल दे जवानी बदल दे .
वो कह दे तो सूरज छिपे बादलों में,
वो कह दे तो दरिया रवानी बदल दे .
कभी दे ज़मीं आसमां दे कभी वो ,
वो जब चाहे तब जिंदगानी बदल दे .
नदी खारी कर दे वो सागर को मीठा,
वो जिसकी भी चाहे निशानी बदल दे .
हमेशा नहीं कुछ भी रहता किसी का,
वो राजा बदल दे वो रानी बदल दे .
* डॉ .कमलेश द्विवेदी

2.***पापा अब मैं बच्चा नहीं***
झूठे पर था भरोसा नहीं.
सच्चा,सच्चा निकला नही.
धोखे से टकराया हूँ,
मेरी फितरत धोखा नहीं.
उसने काफी कोशिश की,
फिर भी ये दिल lटूटा नहीं.
उस बेटे को रोटी माँ,
जिसने रिश्ता रक्खा नहीं.
कोई भी सौदा कर लो,
लेकिन मौत का सौदा नहीं.
उसने गलती की है पर,
इतना गुस्सा अच्छा नहीं.
ये माना तुम पत्थर हो,
लेकिन मैं भी शीशा नहीं.
देख रहा हूँ कबसे मैं,
अब बस और तमाशा नहीं.
कसमें-वादे-प्यार-वफ़ा,
मैं तो कुछ भी भूला नहीं.
मुझसे मिलने आये हो,
आज किसी ने टोका नहीं.
मैं सब कुछ कह सकता था,
पर छोटा था,बोला नहीं.
मंजिल खुद चलकर आये,
ऐसा मैंने देखा नहीं.
सच के लिए लड़ने वाला,
मैं ही एक अकेला नहीं.
जब तू मेरा हिस्सा है,
मैं क्यों तेरा हिस्सा नहीं.
समझाने पर बोला वो-
पापा अब मैं बच्चा नहीं.
*डॉ.कमलेश द्विवेदी.

3. **** उसकी खता नहीं है ****
बस नाम ही पता है घर का पता नहीं है.
मिलने का उससे कोई क्या रास्ता नहीं है.
मैं चाहता हूँ मुझसे रूठे वो मैं मनाऊँ,
पर ख्वाब में भी मुझसे वो रूठता नहीं है.
कांटे दिए हैं उसने तो फूल भी दिए है,
कैसे कहूं कि मुझको वो चाहता नहीं है.
माना है दूर मुझसे फिर भी करीब है वो,
साया भी उसका मेरा संग छोड़ता नहीं है.
हमको भी देखता है तुमको भी देखता है,
पर हम समझते कुछ भी वो देखता नहीं है.
मुझको न मिल सका वो यह बात सच है लेकिन,
मेरी खता है इसमें उसकी खता नहीं है.
*डॉ.कमलेश द्विवेदी

4.**** ग़ज़ल ****
झूठ कहता है कब आइना.
हमको लगता है रब आइना.
कोई देखे भले ना उसे,
देख लेता है सब आइना.
क्या कहोगे बताओ ज़रा,
सामने होगा जब आइना.
जो मैं तुमसे नहीं कह सका,
वो भी कह देगा अब आइना.
झूठ का कोई पत्थर चले,
टूट जाता है तब आइना.
डॉ.कमलेश द्विवेदी

5.***”ग़ज़ल गरिमा”(जोधपुर)के जनवरी-मार्च २०१२ में प्रकाशित***
सोच रह हूँ ख़त लिखने की लेकिन क्या पैगाम लिखूं.
तुम बिन काटी रात लिखूं या साथ गुज़ारी शाम लिखूं.
मेरा दिल तो तूने मुझसे जाने कब का छीन लिया,
अब क्या मेरे पास बचा है जिसको तेरे नाम लिखूं.
तुझको खास लिखूं तो कितने लोग खफा हो सकते हैं,
लेकिन केवल इस डर से मैं कैसे तुझको आम लिखूं.
तू बतला क्या नाम लिखूं मैं हम दोनों की जोड़ी का,
लैला-मजनूं,शीरी-फरहद,सब्जपरी-गुलफाम लिखूं.
दर्द बताना भी मुश्किल है और छिपाना भी मुश्किल,
होठों की ख़ामोशी लिख दूँ या दिल का कुहराम लिखूं.
तू भी कुछ लिख दे तो अपना अफसाना पूरा होगा,
मैंने ही आगाज़ लिखा है क्या मैं ही अंजाम लिखूं.
*डॉ.कमलेश द्विवेदी

6.*** ग़ज़ल ***
दिल की बातें दिल तक पहुंचें..
यानी वो मंज़िल तक पहुंचें.
दरिया में जो साथ हमारे,
सब के सब साहिल तक पहुंचें.
क़त्ल हुए हैं ख्वाब किसी के,
कैसे हम क़ातिल तक पहुंचें.
जिनकी राह निहारे महफ़िल,
वो भी तो महफ़िल तक पहुंचें.
आसानी से हल कर लें हम,
मसले क्यों मुश्किल तक पहुंचें.
*डॉ.कमलेश द्विवेदी


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