गीत

1.**** कोई पेड़ लगाता है ****
कोई पेड़ लगाता है फल दूजा कोई खाता है।
उसको है मालूम मगर वो पेड़ लगाये जाता है।।
कितने पेड़ लगाये उसने,
कितनों की तैयारी है।
सारे पेड़ों का विकास हो,
उसकी जिम्मेदारी है।
वो अपनी ये जिम्मेदारी पूरी तरह निभाता है।
कोई पेड़ लगाता है फल दूजा कोई खाता है।।
सर्दी-गर्मी या वर्षा हो,
उसको चिंता किसकी है।
कैसे पेड़ फलें-फूलें बस,
उसको चिंता इसकी है।
और इसी चिंता में डूबा वो दिन-रात बिताता है।
कोई पेड़ लगाता है फल दूजा कोई खाता है।।
उसको मोह बहुत होता है,
पेड़ों से,हर डाली से।
उसको कितना सुख मिलता है,
बगिया की रखवाली से।
कोई पेड़ कटे या सूखे वो कितना दुख पाता है।
कोई पेड़ लगाता है फल दूजा कोई खाता है।।
डॉ.कमलेश द्विवेदी,कानपुर
मो.09415474674

2. *** मन के गीत लिखूं मैं ***
अपनी सांसों के अपनी धड़कन के गीत लिखूं मैं .
जब-जब तुमसे मुलाकात हो मन के गीत लिखूं मैं .
कितना प्यार दिया है तुमने
कितना प्यार दिया है .
मैंने जो भी चाहा तुमने
वो अधिकार दिया है .
यों ही मुझसे बंधे रहो बंधन के गीत लिखूं मैं .
पतझर के मौसम में भी सावन के गीत लिखूं मैं .
जब भी कभी सामने बैठो
मैं बस तुम्हें निहारूं .
पल-पल खुद को देखूं,पल-पल
अपना रूप संवारूं .
ऐसे मुझे संवारो तो दरपन के गीत लिखूं मैं .
मेरे और तुम्हारे अपनेपन के गीत लिखूं मैं .
यों तो सारी दुनिया को मैं
अपने गीत सुनाऊँ .
लेकिन मन से सदा तुम्हारी
खातिर ही मैं गाऊँ .
तुम भी संग-संग गाओ तो बचपन के गीत लिखूं मैं .
मीठी सुधियों वाले घर-आँगन के गीत लिखूं मैं .
* डॉ .कमलेश द्विवेदी

3.युगीन काव्या (मुंबई) के प्रेम विशेषांक में प्रकाशित मेरा गीत
***** पत्र पुराने पाए ******
आज साफ की अलमारी कुछ पत्र पुराने पाए
उन्हें पढ़ा तो कितने मंजर हमें नज़र फिर आये
पहले पत्र पढ़ा जो तुमने
पहली बार लिखा था
तुम करते हो हमको कितना
ज्यादा प्यार लिखा था
आज प्यार के सागर में हम फिर डूबे -उतराए
आज साफ की अलमारी कुछ पत्र पुराने पाए
फिर क्रमशः वे पत्र पढ़े जो
तुमने भेजे अक्सर
जिनमे से कुछ के तो अब तक
हम न दे सके उत्तर
अंतिम पत्र तुम्हारा पाया जब तुम हुए पराये
आज साफ की अलमारी कुछ पत्र पुराने पाए
उसमें तुमने हमें लिखा था –
अब हम तुम्हें भुला दें
और तुम्हारे पत्रों को हम
रक्खें नहीं,जला दें
पर अपने ही दिल को कैसे कोई आग लगाये
आज साफ की अलमारी कुछ पत्र पुराने पाए.
डॉ.कमलेश द्विवेदी

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